गय-काश्य का विवेचन पेसा कोई प्रतिबंध नहीं है। वह इस प्रकार के प्रतिपंधों से स्वतंत्र रहता है। उसकी रंगशाला इसी में रहती है। उसके भाव तथा उसकी वस्तु तो उसमें रहती ही है, साथ ही वेध-मूषा, रश्य-पट और माठा-कला अन्य उपचार भी उसी के अंतर्गत होते हैं । अतएष यह स्पष्ट है कि नाटक जिन नियमों से अको रहते हैं, उनसे उपन्यास पूर्णतया स्वतंत्र है। परंतु नाटक के रश्य काव्य होने से उसमें जो सजीयता या प्रत्यक्षानुभव की छाया रहती है, यह उपन्यास मै नहीं हो सकती हश्य तथा अन्य कान्य का अंतर रन्हीं दोनो-नारक और उपन्यास-में स्पट हो जाता है। अतएव उपन्यास में, उसके दृश्य काठय म होने के कारण, जो सजीवता और प्रत्यक्षानुभष का अभाव रहता है, उसे वह नाथ-कला के नियमों से स्वतंत्र होने के कारण अस्य उपायों से पूरा कर लेता है। इस विवार से हम यह भी कह सकते हैं कि नाटफ काव्य-कला का कोसाध्य और उपन्यास सरल रूप है। कुछ लोगों का तो कहना है कि नाटक लिखने के पहले इस कला से पूर्णतया अभिझ होना तथा रंगशाला की आवश्यकताओं और उसके प्रतिबंधेरे का भली भाँति जानना आवश्यक है, परंतु उपन्यास के खिये इन बातो को आवश्यकता नहीं। उसके लिये तो कलम, दायात, कागज, कुछ अवकाश और घोड़े से धैर्य की ही आवश्यकता है। इस कथन में चाहे उपन्यास की अपेक्षा नाटक को अधिक महत्व दिया गया हो, परंतु इसमें संदेह नहीं कि नाटकों के संबंध में विषेचन का आदर्श स्थिर करना
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