साहित्यासोचन उतमा कठिन नहीं है जितमा उपन्यासों के विषय में है। फिर मी विवेचन करके उपन्यासों के संबंध में हम कुछ नियम निर्धारित कर सकते है। पहले तो उपन्यासों का संबंध घटनाओं और व्यापारों से, अर्थात् इन बातों से होता है जो सइन या संपादित की जाती हैं। इन्दी को हम "उगम्यात-मस्तु" कहते हैं। दूसरे उपन्यास य घटनायें और व्यापार मनुष्यों के आश्चित होते हैं। केय अर्थात् उन बातों को सहने या करनेवाले मनुष्य होते है जो व्यापार की लंघला का स्थिर रस्त्रते हैं। इन्हें "पात्र" कहते हैं। उन पानी का आपस में बालाप तीसरा नत्य है जिसे "कथाकथन करते है और जिसका चरित्र चित्रण से घटा घनिष्ट संबंध है। ये सब व्यापार या भटनाग किसी समय या स्थान में होनी चाहिएँ, जहर मोर: जिसमें पाया को अपना कार्य करना नया सुख-दुख भोगना पड़ता है। इस देशकाल" कहते है। यह चौथा तत्व है। पाँच लत्य शैली" और छटा “उद्देश्य है । प्रत्येक उपन्यास में स्त्रक को जीवन संबंधी अपने विचारों को परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप में प्रकट करना पड़ता है। इसके निमित्त उसे अपने विचारों के अनुसार घटनाओं का कम-स्थापन, पात्रों के राग-भाव आदि का प्रदर्शन तथा वस्तु- निवेश इस प्रकार से करना पड़ता है जिसमें वह अपने सांसा- रिश भाव और जीवन के लक्ष्य प्रकट कर सके। अतएव उपन्यास के छः तत्व होते हैं: यथा-वस्तु, पात्र, कथोपकथन,
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