पीछा करने की आवश्यकता ही नहीं है। पर जहाँ विवेचन का दंग दूसरे का हो, विचारों की श्रृंखला दूसरे की हो, उनके सजाने का ढंग भी अपना न हो, और केवल भाषा में रूपांतर मात्र हुआ हो, वहाँ मौलिकता की अलक का भी मिलना असंभव है। मेरे इस ग्रंथ में मौलिकता कितनी है तथा इसरो की प्रतिचाया कितनी है और कहाँ तक मैं अपने उद्योग में सफल दुआ है, इसका निश्श्य करना विद्वानों का काम है। मुझे तों फेयल इसी बात से संतोष हो जायगा, यदि यह ग्रंथपा-प्रदर्शक का काम देकर अन्य विद्वानों को इस विषय के उसमोत्तम प्रन्थ लिखने के लिये उत्साहित कर सके । साहित्यिक आलोचना का यह प्रारंभिक गंध है । यह केवल उस गहन विषय के लिये प्रस्तावना का काम दे सकता है। इसके भिन्न भिन्न अध्यायों पर स्वतंत्र ग्रंथ लिने जा सकते हैं। मुझे आशा है कि हिंदी के प्रेमी विद्वान् साहित्य के इस अग की पुष्टि की ओर अवश्य ध्यान दंगे। इस ग्रंथ का अभी थोड़ा ही, लगभगतृतीयांश ही, लिखा गया था कि मेरे स्नेहभाजन बाबू रामचंद्र वर्मा ने अपनी नवोदित साहित्य-रन-माला में इसे पहला ममका बना कर गूधने का संकल्प प्रकट किया। मैंने उसी समय उनकी इच्छा की पूर्ति का निश्चय कर लिया, पर मैं यह नहीं जानता था कि "हाँ" कर देने ही में मुझे कितनी आपत्तियों और कठिना-
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