साहिस्थालोचन १२० कल्पित कथा ही है, उसमें सत्यता कदाचित ही कहीं मिल सके, अपने को भ्रम झाल में डालना है। उपन्यासकार जीवन की साहे जिस पटना या स्थिति को लेकर अपना काल्पनिक राज्य स्थापित करें, पर उसके लिये यह आवश्यक है कि वह उस घटना श स्थिति के रहस्यों और विशेषताओं से पूर्ण- तया परिचित हो। यदि उसमें रस ज्ञान का अमाप हो, तो नसे उचित है कि उसके चित्रण करने का साइस न करे। मान लीजिए कि कोई उपन्यासकार किसी काल की पेतिहा- सिक स्थिति का चित्र सपने उपन्यास द्वारा उपस्थित करमा चाहता है । अब उसके लिये यह आवश्यक है कि वह उस काल की सामाजिक, राजनीनिक आदि स्थितियों का पूरा पूरा पनि- ज्य प्राप्त करे । उसे यह जानना आवश्यक है कि उस काल में राजाओं, रानियों, राजकुमारों, गलकुमारियो, राज्य के पड़े बड़े अधिकारियों, सेनाओं नथा साधारण प्रजा के रहन-सहन का क्या हंग था. राजकार्य किस प्रकार चखना था, शासन कैसे होता था, महलों में क्या व्यवस्था थी तथा उस समय को राजनीतिक स्थिति कैसी थी। इन बातों को जाने बिना मौर्य- काल, गुप्त-काल या मुगल काल की घटनाओं पर उपन्यास लिसन का साइस करना अपनी मूर्जता प्रकट करते हुए एक ऐसा चित्र उपस्थित करना है जो वास्तविकता से कोसों दूर होगा और जिसके कारण मिथ्या कान का प्रचार पड़ेगा। कुछ आचार्यों का कहना है कि जिस विषय का स्वयं अनुभव न कर
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