गद्य-काव्य का विवेचन अनुकूल है और क्या कथा या वस्तु को समाहार पूर्वापर विचार से ठीक ठीक हुआ है? यदि इन प्रश्नों का संगेपजनक उत्तर मिल सके, तो समझना चाहिए कि उपम्पास की वस्तु का विण्यास भली भाँति किया गया है। इसके अतिरिक्त यह बात भी ध्यान में रवनी चाहिए कि वर्णन शक्ति का संपादन भी उपेक्षा योग्य नहीं है। कोई कहानी कहने में भी कौशल की आवश्यकता होती है। और यह कौशल किसी व्यक्ति की पिहसा या बुद्धिमानी से मित है। विद्वान या पुद्धिमान होने ही से यह कौशल स्वतः नहों आ जाता । उस कौशल के संबंध में इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखना चाहिए कि उसमें कट-कल्पनाया अस्थाभाविकता तो नहीं है और क्या सुननेवाले का मन उसकी ओर सहज ही आकृप हो जाता है। यदि किसी कहानी के कहने में सुगमना, स्वाभाविकता और मनोमुग्धकारिता स्पष्ट देख पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि कहानी काहनेवाले में अपने व्यापार का जैसा कौशख चाहिए, वैसा है। यदि उसमें ये गुण न हो तो उसे इनके उपार्जन को ओर दत्तचित होना चाहिए । वस्तु चिन्यास के विचार से उपन्यासों के दो भेद माने जाते हैं। एक तो वे जिनमें भिष मिन घटनाओं का एक प्रकार से असंबद्ध वर्णन रहता है। वे घटनाएँ एक दूसरी पर आश्रित महीं रहती और म दूसरी घटना पहली घटना का आवश्यक पा अनिवार्य परिणाम होती है। इन घटना-समूहों को एक सूत्र
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