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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१४६

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११५ गद्य-काव्य का विवेचन चाहिए । संबवता भी इतमी न हो कि उपन्यास में कष्ट कल्पना का दोष आ जाय और स्वाभाविकता नाम मात्र को बह जाय। अंसबनता भी इतनी न होनी चाहिए कि किसी उपन्यास के भिन्न भिन्न परिच्छर अलग अलग कथायें जान पड़ें। किसी किसी उपन्यास में दो कथाओं का समावेश भी कर दिया जाता है। यदि ऐसा हो, तो इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दोनों कथाएँ आपस में ऐसी मिल जायें कि वे अलग अलग महान पड़ें। उनका दूध और चीनी का सा संमिश्रण होना आवश्यक और बांदनीय है। उपन्यासों की कथा करने के तीन ढंग हैं। पहले में तो उपन्यासकार इतिहासकार का स्थान ग्रहण करके और वर्णनीय कथा से अपने को अलग रखकर अपने वस्नु-विधान का क्रमशः प्रदान करता हुआ पड़नेवालों को अपने साथ लिए हुए अंतिम परिणाम तक पहुँचाकर अपना अभिप्रेत प्रभाव उत्पन्न करता है। दूसरे ढंग में उपन्यासकार नायक का आत्मचरित उसके मुँह से अथवा कभी कभी किसी उपपात्र या गोण पात्र के मुँह से कहलाता है। तीसरा दंग वह है जिसमें प्रायः चिट्टियों आवि के द्वारा कथा का उद्घाटन किया जाता है। तीसरा दंग चाटुम क्रम और पहला ढंग बहुत अधिक काम में लाया जाता है। पहले दंग का अनुसरण करने में मंथकार को अपनर कौशल दिखाने का पूरा पूरा अवसर मिलता है। दूसरे और तीसरे दंग का अनुसरण करने में उसे कई कठिनाइयों का सामना