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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१४९

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साहित्यालोचन १२८ बाहर हो गया है। वे स्वतंत्र संकल्पवास पात्र अपने मनोबेगों से प्रेरित होकर काम करते हैं। और कमी कभी उनके कचन या कार्य ऐसे हो जाते है जिनका लेखक को कमी अनुमान भी नहीं होता। यहाँ हम कल्पना शक्ति की पराकाष्ठा देखते हैं और इसके रहस्य का उद्घाटन करना लेखक या समालोचक दोनों के लिये असंभव है। सृष्टि-वैचित्र्य का सिद्धांत ही इस माम- सिक कल्पना मैं गर्मिन जान पड़ता है। अतपय इस मानसिक कल्पना को सृष्टि की कथा को छोड़कर हम केवल इस बात पर विचार करना चाहिए कि किन उपायों का अबलंबन करके लेखक चरित्र-चित्रण में सफल हो सकता है। इसके लिये सबसे आवश्यक कात सजीव वर्णन करने की शक्ति है। किसी नाटक के अभिनय में जो काम किसी पात्र की येष-भूषा, बाल-चाल, रंग-ढंग नथा नाश्य-कौशल से निकलता है, वही काम उपन्यास-लेखक को अपने वर्णन- कौशल से लेना पड़ता है। जैसे किसी रश्य काव्य में किसी पात्र और इसके अभिनय को देखकर हम उसके चरित्र से परिचित होते है, से ही उपन्यास में उसके आकार प्रकार और काग-रंग का जीता-जागता वर्सन पढ़कर हम उससे अपना मानसिक संबंध स्थापित करते हैं। उपन्यास के पात्र की शारी- रिक वनावट या प्रश्.नि आदि में जो कुछ विशेषता हो, किसी संकट के समय उसकी भावभंगी और आचार-जयवहार में जो कुछ महप्ता या विशिएता हो, वह पाठकों के मानसिक नेत्रों के