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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१५

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इयों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने गत नबंर मास में इस ग्रंथ के लिन्त्रित अंश को खेकर उपवामा आरंभ कर दिया और शेष अंश के लिये जगावर होना आरंम हो गया। इस तगादे ने कमशः विकट रूप धारण किया और उधर समय के अभाव में रुकावटेडालना अपरंभ कर दिया । इस स्थिति में कई सप्ताह तक रहने के कारण मैं चाइ रामचंद्र वर्मा को धन्यवाद वो दे ही नहीं सकता; परंतु साथ ही अब जय कि यह ग्रंथ समाप्त हो गया है, मुझे इस बात का स्वीकार करने मे भी किसी प्रकार का संकोच नहीं है कि यदि उनका कहा तगादा न होता, वे मुझे निरंतर उत्साहित न करने, सामग्री आदि का संग्रह करने में मेरी सहायता न करते, तो यह भी संघल संभव ही नहीं एक प्रकार से निश्चित था कि यह ग्रंथ अमी कई महीनों तक समाप्त न होता। यहाँ पर एक निवेदन और कर देना उचित जान पड़ता है। जब मैंने इस अंथ को लिखना आरंभ किया था, जब मैंने सोचा था कि मैं इसे लग- भग २०० पृष्ठों में समाप्त कर दूंगा. पर ज्यौ रूपों इसकी तैयारी होती गई, त्यो स्पो इसका आकार यढ़ता गया और अंत में यह मेरे पूर्व निक्षित संकल्प से दूला हो गया। फिर भी संचित सामग्री में से बहुत कुछ बच रहा और उसका उपयोग न हो सका । यदि सब सामनी का पूरा पूरा उपयोग किया जाता, सो इस ग्रंथ का आकार इससे ज्यादा तो अवश्य हो जाता। पर ऐसा करना मेरे उदेश्य के अनुकूल न था। अब यदि