सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१५६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

गद्य काव्य का विवेचन अनुभव करते हैं। वह कथा को चटकीला बना देता और लेखक का कोशल स्पए प्रकट कर देता है। यद्यपि कथोपकथन का उद्देश्य प्रायः यस्तु का विकास करना माना जाता है, पर सास्तव में उसका संबंध पात्रों से है। उसके द्वारा राग क्षेत्र, प्रवृत्ति, मनोवेग आदि का प्रस्फुटन, पात्रों की स्थिति का घटनाओं के अनुकूल परिवर्तन और उनका एक दूसरे पर प्रभाव पडत अच्छी तरह दिखाया जा सकता है। कुशल लेनक, ओ अभिनयात्मक ढंग को अधिक पसंद करता हो, इसके द्वारा चरित्र का विश्लेषण तथा उसकी व्याख्या बड़ी सुगमता से कर सकता है। और यदि गेसा करने में स्वाभा- विकता बनी रहे, तो मानी सोने में सुगंध आ जाती है। यदि विश्लेषणात्मक दंग का भी प्रयोग किया जाय, तो भी वह लेखक को उद्देश्य-सिद्धि में पड़ी सहायता पहुंचा सकता है। कथोपकथन का पहला उद्देश्य वस्तु का विकास तथा पानी का चरित्र चित्रण होना चाहिए । असंरख पातेलाने में इसका प्रयोग कदापि नहीं होना चाहिए, साई बं बातें कितनी ही मन को प्रसन्न करनेवाली और परिहास का संचार करनेकाखी क्यों न हो। हाँ, यदि उनका प्रयोग किसी पात्र का चरित्र-चित्रण करने के लिये हो तो बात दुसरी है। जिस बात का उपन्यास को कथा, उसके उद्देश्यअथवा पात्र से कोई संबंध न हो, उसके विषय में कुछ कहना या लिखना मानों उसमें स्पए असंगति-दोष सामा है । कथोपकथन में बाहरी अथवा ऐसी बातो का प्रयोग,