धित पाठक औरसमालोचक महोदय मुझे इस अंथ की त्रुटियाँ यताकर इसके सुधारने का परामर्श देंगे, नो आशा है कि दूसरे संस्करण में, यदिइसका सौभाग्य इसे शीघ्र प्राप्त हो सका तो, उनसे लाभ उठाने में अपने को धम्य मानूंगा। इस ग्रंथ के पहले चार अध्यायों को कृपापूर्वक पढ़कर और उन्हें सुधारने का परामर्श देकर पूज्य पंडित महावीरप्रसादजी द्विवेदी ने मेरा बड़ा उपकार किया है। इसलिये मैं उन्हें हदय से धन्यवाद देता है। यदि वे इसे छपने के पहले एक बेर आदि से अंत तक पढ़ जाते तो मैं अत्यंत उपकृत होता; पर न तो उनकी अस्वस्थता के कारण मुझे उसे इतना कष्ट देने का साहस ही हुआ और न बार रामचंद्र वर्मा इसके लिये आवश्यक अवकाश देने में ही सहमत हुए। फिर भी मैं कृतज्ञता- पूर्वक इतमा अवश्य स्वोकार करता है कि श्रदेय द्विषेवी जी के परामर्शी से मैने पूरा लाभ उठाया है और समके अनुसार ग्रंथ के शेष अंश को प्रस्तुत करने का उद्योग किया है। पंडित रामचंद्र शुक्र को भी मैं धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सकता। उन्होंने पूर्वाश की तैयारी में मुझे उचित परामर्श देकर तथा एक येर उसे पढ़कर मुझे उपकृत किया है। यह इस ग्रंथ के आरंभ,मणयन तथा समाप्ति की कथा । इस उद्योग में मैं कहाँ तक कृतकार्य हुआ है, यह तो हिंदी के विद्वान् ही यसावेगे; पर इतना कहे विना मैं नहीं रह सकता कि मुझे अपनी कृति पर सर्वथा संतोष और आनंद है। परंतु
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