१३९ गा-काव्य का चियवन और कोई उसको पिलस्ट आपे से बाहर कर देती है। तात्पर्य यह कि कोई डपम्पास पढ़ते समय इस बात का विचार रखना चाहिए कि यह उपन्यास अथवा उसका लेखक कहाँ तक और किस प्रकार का कोई मनाषिकार उत्पन्न करने में समर्थ है। यदि किसी लेखक की लेखनी सचमुच प्रभावशालिनो हो, यदि वह सचमुच पाठकों के मन में हास्य, करुणा अथवा दुःस आदि विकार उत्पन्न करने में समर्थ हो, तो हमें यह देखना होगा कि यह अपनी इस सामथ्र्य, इस शक्ति का कहाँ तक सदु- पयोग अश्रधा दुरपयोग करता है। उदाहरण के लिये परिहास को ही लीजिए । परिहास को हम प्रतिभा की सब से यही देन कह सकते हैं और इसके कारण किसी उपन्यास का सौंदर्य बहुन कुछ बढ़ सकता है। पर साथ ही यह भी संभव है कि कोई हारपश्यि लेखक परिहास का अश्लीलता की सीमा तक पहुँचाकर उसका दुरुपयोग कर दाले; अथवा बह पेस पुरे दंग से या बेमौके परिहास कर सकता है कि उसटे स्वयं वह और उस का परिहास दोनों ही हास्यास्पद हो जायें। कोई परिहास मन को प्रसन्न करने के बदले दुःखी अथवा कुछ भी कर सकता है। परंतु फिर भी परिहास के उपयोग के संबंध में कोई सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती क्योंकि कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिन्हे वेनकर मनुष्य के मन में करुणा तो उत्पन्न होती ही है, पर साथ ही कभी कमो हंसी भी आ जाती है। किली बदमस्त शराबी को देखकर वस्तुतः मन में करुणा का ही आविर्भाव
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