गय-काव्य का विवेचन वर्णन करते हैं कि या तो पाठकों का जी ऊर माता है या उनका चित्त इतना अधिक ब्याकुल और दुःस्त्री हो उठता है कि उसके संभालने में हो बहुत समय लग जाता है। यह मवृत्ति भावुक बंगाली लम्सको में बहुत अधिकता से पाई जाती है। ये बात वान में अपने पात्रों को कला देते हैं, जिससे पढ़ने- वाले के मन में करुणा रस का संचार तो होता नहीं, उस्टे एक प्रकार की अमचि उत्पन्न हो जाती है। बंगला के प्रसिद नाटककार गिरीश घोप के प्रायः सभी नाटकों के किसी किसी पात्र पर इतनी अधिक विपत्ति दाई गई है कि अंस में उसके पागल होने की नौबत आ गई है। यहाँ भी सब बाते लेखक के विवेक ओर विचारशीलता पर ही निर्भर करती है। और कोई पेसा नियम निश्चित नहीं हो सकता जिससे यह जाना जा सके किस सीमा तक करुण रस का संचार उचित और इसके आगे अनुचित है। हम केवल यही कह सकते हैं कि लेखक को इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए कि पाठकों के पित्त पर गेसी सभी बातों का कुछ न कुछ परि- गाम या प्रभाव होगा और उसे पथासाप इस बात का उघोग करना साहिए कि उसका ऐसा वर्णन अप्रिय अथवा सटकनेवाला न हो। यदि किसी उपन्यास को समाप्त करने के उपगंन हमारी यह धारण हुई कि उसके अमुक वर्णन ने इमारं मन को आवश्यकता से अधिक चुन्ध किया. व्यर्थ ही हमें उत्तेजित कर दिया, अथवा समाप्ति के उपरांत भी हमें
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