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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१७

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वास्तविक आनंद और संतोष तभी हो सकता है जब यह दूसरों को भी संनुए और आनंदित करने तथा विद्यार्थियों का उपकार करने में समर्थ हो । जगनियंता जगदीश्वर मेरी या आशा और भार्थना भी पूरी करे। काशी माघ ०७ सं०१६७ वि० श्यामसुंदर दास ।