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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१७१

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प्यास्या साहित्यालोचन १५० सकें । औषन के संबंध में लेखक का जो कुछ अनुभष या मिरी- क्षण होगा, यह अवश्य लोगों के जीवन-मुधार में बहुत कुछ सहायक होगा । और केवल इसी दृष्टि से उपन्यास का उद्देश्य निश्चित होना चाहिए। उपन्यासों में जीवन का आलोचन अथवा नैतिक सिद्धांतों का प्रतिपादन वो प्रकार से होना है। कुछ उपन्यास-लेखक तो, नाटककार की भाँनि, सब घटनाओं और पातों को जीवन की उनके वास्तिविक रूप में ही अपने पाठकों के सामने उपस्थित कर देने है। संसार के मनुष्यों और चरित्रों को ने जिस रूप में देखने अथवा पाते हैं, उसी रूप में वे उनको चित्रित करके छोड़ देते हैं और वस्तु-यिन्यास के दंग से दो वे अपने नैतिक सिद्धांतों का प्रतिपादन कर देते है। अर्थात् वे अपनी कल्पना की सहायता से संसार का एक सूक्ष्म अथवा संक्षिप्त रूप से दंग से अंकित करते हैं, जिससे नैतिक सितांत स्थिर किए जा सकते हैं। कंवल पानी के चरित्र-चित्रण और कथानक के विकास से ही ये जीवन अथवा नीति-संबंधी अपने विचार और सिद्धांत प्रकट कर देते हैं। और तय पाठक अधषा आलोचक का यह काम रह जाता है कि यह उपन्यास में इधर उधर धिसरी हुई बातों के आधार पर कुछ नैतिक निष्कर्ष निकाल ले। यहाँतको उपन्यास और नाटक दोनों एक ही ढंग से चलते हैं। दोनों कुछ घटनाओ अथवा बातों को लोगों के सामने उप-