१५१ गद्य-काव्य का विवेचन स्थित कर देते हैं और परिणाम निकालने का काम पाठको पर छोड़ देते हैं। नाटककार को तो स्वयं प्रत्यक्ष रूप से कुछ मी करने का अधिकार नहीं होता. पर उपन्यासकार यदि चाहे तो बीच बीच में स्वयं भी टीका-टिप्पणी कर सकता है। यह उप- न्यास में दिए हुए चरित्रों की आतोलना और कार्यों की व्या- ध्या कर सकता है और उनसे कुछ नैतिक सिद्धान निकालकर लोगों के सामने रख सकता है। अब यह अपना यह अधिकार काम में लाता और अप्रत्यक्ष रूप से चरित्र अंकित करने के साथ ही साथ प्रत्यक्ष रूप से उसकी आलोचना भी करने जगता है, तब वह मानों अपने रचे हुए संसार का आपही आलोचक और व्याख्याता भी बन जाता है। उस दशा में उसकी वही आलोचना और व्याख्या ग्राहरी संसार की भी आलोचनाओर. व्याख्या हो जाती है। यही जीवन की आलोचना का प्रत्यक्ष और दूसरा प्रकार है। किसी उपन्यास के जीवन-संबंधी तत्वों की परीक्षा करते हुप सब से पहले इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसमें मत्यता को मारा कहाँ तक है। पर वह सस्यता उपन्यास वैज्ञानिक सत्यता से बिलकुल भिन्न और "कमि- में सत्यता कल्पना" में मिलनेवाली “सत्यता" के समान ही होगी । हम यह नहीं कह सकने कि उपन्यासों में केवल झूठी ओर कल्पित पाने भरो होनी है और उनमें सत्यता का कोई अंश होना ही नहीं। यह सच है कि कोई उपन्यास आदि से अंत तक
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