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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१७४

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१५३ गा-काव्य का विवेचन सदा एक रस रहता है। उसमें कभी किसी परिवर्तन, परि- बर्द्धन या संशोधन आदि की कोई भावश्यकता नहीं होनी । पंचतंत्र, कादंबरी अथवा शकुंतला में औसत्य प्रतिपादित है, उसमें क्या कभी कोई अंतर पड़ सकता है या वह कभी पुराना और निकम्मा हो सकता है? किसी ने कहा है-"उपन्यास में नामी और तिथियों के अतिरिक्त और सब बाने ससी होती है और इतिहास में मामा और तिथियों के अतिरिक्त और कोई बात सम्ची नहीं होती।" इस उद्धरण से हमारा यह तारपर्य नहीं है कि इतिहासों में कुछ भी तथ्य नहीं होना। हमारा अभिमाय तो केवल यही है कि लोग भली भाँति समझ ले कि उपन्यासों और नाटकों आदि का महत्व किस प्रकार के सत्य का आश्रित है। उपन्यास लेखक कुछ सनी अथवा संभावित घटनाओं को तोड़-मरोड़कर किसी नए और विलक्षण ढंग से हमारे सामने उपस्थित कर सकता है। पर फिर भी हम यह नहीं कह सकते कि जीवन की वास्त. विक घटनाओं और शक्तियों अथवा आवर्श संभावनाओं से घर दूर जा पड़ा है। हाँ, यदि वह इन पाना से दूर पा पड़ा हो, यदि उसको कृति में हमें आदि से अंत तक बिलकुल असंभष और अनुपयुक बात दी मिलें, जैसा कि हिंदी के गेयारी के और तिलस्मी उपन्यासों में मिलती हैं, तो हम कह सकते हैं कि मनस्त्रक ने उपन्यास के वास्तधिक उद्देश्य अवयर लक्ष्य पर कुछ भी ध्यान नहीं रखा और इस दृष्टि से उसकी शक्ति प्रशंसनीय नहीं है।