साहिन्यालीसम उपम्पास में जो सत्यता होती है, वह वास्तव में उसकी वास्तविकता अथवा मंभावना से संबद्ध होती है। जो बात वास्तविकता संभव हो, अथधा जो निन्य किसी न किसी रूप मैं वास्तव में होती हो, उसी को जपायास में स्थान मिलना चाहिए। साथ ही कोई ऐसी बाधा भी नहीं होनी चाहिए जिससे लेखक अपनी कहाना शक्ति से पूरा पूरा काम A से सके । लेप को मसार और जीवन की धास्तविक ताओं का भली भाँनि निरीक्षण करना चाहिए और यथासाध्य उनका ज्यों का न्यो चिन फित करना चाहिए । पर कहीं कहीं इस सिद्धांत का भी दुरुपयोग हो सकना और होता है । दृष्टता और नीचमा आदि का एक ही स्थान में कोई दिक्षा चित्र चा आ सकता है जिस पर असश्व होने का ता दापन लग सकता हो, पर फिर भी जीजीवन की साधारण वास्तविकताओं से बहुत दूर जा पड़ता हो। अथवा किसी बहुत ही साधारण और नित्य होनघाली बात का ऐसा लंबा-चौड़ा वर्णन हो सकता है जो वास्तविकता से तो दूर न हो, पर फिर भी अनावश्यक और निरर्थक हो।कपि, खेसकया चित्रकार आदि को सत्यता, वास्तविकता और कल्पना का मेल मिलाना पड़ता है। उसका अंकित चित्र वास्तविक भी होता है और कल्पित भी । वह वास्तविक नो इसलिये होता है कि सचमुच होनेवाली घटनाओं से बहुन कुछ मिलता-जुलता होता है, और कनिषस इसलिये दोता है कि वास्तवमै उसका कोई अस्तित्व नहीं होगा तात्पर्य
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