साहित्यालोच्चम माटको की भौसि इनसे भी अच्छी नैतिक शिक्षा मिल सकती है और इनसे मी मनोरंजन होता है। यही कारण है कि आस- कल पेसी आख्यायिकाओं अथचा कहानियों का प्रचार पद्धत बढ़ता जाता है। इनका इतना बढ़ता हुआ प्रचार देखकर कुछ लोग तो यहाँ तक कहने खग गए हैं कि कुछ दिनों में उपन्यास रद्द ही न जायेंगे और ये कहानियाँ ही उपन्यासों का स्थान ले सैमी । पर हमारी समझ में यह आशंका निर्मूल ही है। पयोंकि उपन्यास का काम आस्यायिकाओं से कभी निकल ही नहीं सकता । आख्यायिका के हारे क्षेत्र में जीवन की उतनी अधिक विवेचना हो ही नहीं सकती, जितनी उपन्यास में होती है। उसमें पात्रों के चरित्र का उनना अच्छा विकास और चित्रण भी नहीं हो सकना, जिसके लिये उपन्यासों का इतना महन्य और आदर है। हिंदी में बहुत पई घरे उपन्यासी का तो अभाव ही है, पर फिर भी हम कह सकते है कि परीक्षा-गुरु अराधा प्रेमाश्रम आदि में जीवन के जिनने चित्र मींचे गप है, उतने चित्र एक क्या कई आख्यायिकाओं में भी नहीं आ सकते। जिस पकार संसार में मनुष्यों के व्यवहारों और कार्यों आदि का निरीक्षण करने में हमें वटुन अधिक समय लगता है. उसी प्रकार पुस्तको में भी उनसे परिचित होने के लिये अधिक समय लगना आवश्यक और अनिवार्य है। छोटी कहानियों में उनके पात्रों का और हमारा बहुत ही थोड़े समय के लिये साथ होता है और हमें उनके बहुत ही थोड़े कार्यों और व्यवहारों आदि का
पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१७९
दिखावट