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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१८०

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१५९ गय-काम्य का विषेचन परिचय मिलता है। हमारे चित्त पर उनके अध्ययन से जो प्रभाव पड़ता है, वह भी अपेशाकन यहुन ही अल्प और थोड़े महत्व का होता है। जब तक जीवन की जटिलताएं रहेंगी और अब तक वोगों को खूबम से भी मुहम बात जानने की रुचि रहेंगी, तर तक उपन्यासों का स्थान आख्यायिका नहीं से सकेंगी। पर इस समय हम इस बात का विचार करने नहीं रेटे हैं कि उपन्यास और आख्यायिका में से कौन श्रेष्ट अथवा अधिक स्थायी है। हम तो उपन्यास की ऑति आख्या- यिका को भी गद्य-काव्य का एक अंग मानते हैं और इसी दधि से उसका विवेचन करते हैं। सय से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि आख्यायिका था छोटी कहानी कहने किसे हैं। आजकल जैसी कहानियों का प्रचार बढ़ रहा है, उनको देखते हुए मम कह प्रात्याविका सकते है कि आम्यायिका से गय कथानक को का रूप कहते है, जो अंटे दोघंटे के अंदर ही पढ़कर समाप्त किया जा सके, अर्थात् ऐसी कहानी को थोड़े से अरकाश के समय एक ही बैठक में समान हो सके। आख्यायिका कभी उपन्यास का संक्षिप्त रूप नहीं हो सकती क्योंकि जो वानें किसी उपन्यास के सौ दो सौ पृष्टी में आ सकती है, वे दस बोस पृष्ठों को किसी आख्यायिका में नहीं आ सकती। प्रायः सभी देशो में वृद्धा त्रियाँ संध्या समय घर में बैठकर बालकों को अनेक प्रकार की शिक्षामद अथवा कुतूहलवईक कहानियाँ सुनाया करती