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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१९३

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साहित्यालोचन १५२ भाषों और विचारों को इस पर प्रकट करने की रण्डा मानव प्रवृत्ति का एक अभिवार्य गुण है। मनुष्य अपने भाची ओर विचारों को इंगिती या याणी द्वारा अधवा दोनों की सहा- यता से प्रकट करता है। माय और विचारों को अभि- व्यंजित करने की ये रीनियाँ बह मानय समाज में मिलकर सीख लेता है। किसी उत्सव के समय वह इन्हीं भायों को नाच गाकर प्रकट करता है। वाणी और इंगित के अतिरिक्त भावों और विचारों के अभिव्यंजन का एक नीसरा प्रकार अनुकरण या नकल है। वारपावस्था से ही मनुष्य नकल करना सीखता है और उसमें सफल होने पर उसे आनंद मिलता है। यह नकल भी वाणी और इंगित द्वारा सर मनुष्यों को सुगमता से साध्य है। इसके अननर येष-भूषा को नकल का अवसर आता है और यह भी कट-माध्य नहीं है। इन साधनों के उपलब्ध हो जाने पर वायशः दूसरे व्यक्ति के स्थाना- पन्न बनने की पेष्टा पक साधारण सी बात है। पर इनने ही से नाटक का सूत्रपात नहीं हो जाता । जय तक नकल करने की प्राप्ति नाटय का रूप धारण नहीं करती, तब तक नाटक का आविर्भाव नहीं होता। पर ज्यों ही नकल करने की यह प्रवृत्ति नाय फ्रा रूप धारण करनी है,न्या ही माना नाटक का योजा- रोषण होना है। बस यही नाटक का आरंम है। किसी का अनुकरण या नकल करने नाटक को उत्पत्ति या सृषि सो अवश्य हो जाती है, पर इतने से ही उसकी कर्तव्यता का