१७३ रस्य काम्य का विषेचार अंतनहीं हो सकता।नाटक भागे चलकर साहित्य के अनुशासन या नियंत्रण में आ जाता है और तब उसे साहिस्थिक रूप प्राप्त होता है। उस दशा मै हम उसे नाट्य साहित्य कहते हैं। पर यह नाट्य साहित्य सभी जातियों अथवा देशों में नहीं पाया साता। ऐसी भी जातियाँ हैं जिनमें नाटक का प्रचार तो यथए है, घर जिनमें नाश्व साहित्य का अभाव है। अनेक असभ्य जातियों ऐसी हैं जिनमें किसी न किसी रूप में नाटक तो वर्तमान है, पर जिम्होंने अपने साहित्य का विकास अथया निर्माण ही नहीं किया। जिन जातियों ने नाटक को शाम का अथवा साहित्यिक रूप दिया है. उनकी तो कोई बात ही नहीं पर. जिन जातियों के नाटकों को साहित्यिक रूप नहीं प्राप्त दुआ है, उन ज्ञानियों ने भी नाटक के संगीत, नृत्य, भाव-भंगी,. वेश-भूषा आदि भिन्न भिष आवश्यक और वपयोगी अंगों में मन्त्रि या आवश्यकता आदि के अनुसार श्रीदा षष्टुत परिवर्तन और परिवर्तन करके नाटकों के अनेक भेदों और उपभेदों की सृष्टि कर डाली है। परंतु नाटक वास्तव में उसी समय साहित्य के अंतर्गत आ जाता है, जब उसमें किसी के अनु. करण या नकल के साथ ही साय कथोपकथन या वार्तालाप मी हो । नाटक में संगीत या वेश-भूध आदि का स्थान इसके पीछे आता है। साथ ही में इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि नाटक की दृष्टि संगीत और नृत्य के कारण तथा इन्हीं. दोनों से हुई है।
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