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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/१९७

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साहित्यालोचन में भी हुआ करते थे। फसल हो चुकने पर तो ऐसे उत्सव और, अभिनय होते ही थे, पर कहीं कहीं फसल बोने के समय भी इसी प्रकार के उत्सव और: अभिनय दुआ करते थे। उन उसों पर देवताओं से इस बात की प्रार्थना की जाती थी कि खेतों में यथेए धन-धान्य इत्पन हो । भारत में तो अब भी फसलों के संबंध में अनेक प्रकार के पूजन और उत्सव आदि प्रचलित हैं, जिनमें से होती का त्योहार मुख्य है। यह त्योहार गे? आदि की फसल हो जाने पर होता है और उसी से संबंध रखता है। होली के अवसर पर इस देश में भी नृत्य गीन आदि के साथ साथ अनेक प्रकार के स्वाँग निकलते हैं, जो पास्तव में नाटक के पूर्व रूप ही है। यद्यपि आजकल यह उत्सव अश्लीलता के भयोग से बिलकुल भ्रए हो गया है, पर इससे हमारे कधन की पुष्टि में कोई बाधा नहीं होती। प्राचीन काल में जिस प्रकार धन-धाम्प आदि के लिये देव. नाओं का पूजन होना था, उसी प्रकार पूर्वजों और बड़े बड़े पेतिहासिक पुरुषों काभो यूजन होता था। उन पूर्वजों वार पूजा और ऐतिहासिक पुरुषों के भी उन्लब होते थे, जिनमें धन-शाय के लिये उनसे प्रार्थना की जाती थी, अथना उसके लिये उनका गुणानुवाद किया जाता था; और जब नया धान्य तैयार हो जाता था, तब उनको उसका मांग लगाया जाता था। और और बैंगों में तो पूर्वजों की फेवल मूर्तियाँ बनाकर ही मंदिरों में स्थापित कर दी जाती थी, पर मिन और पेक में