साहित्यासोचन २७८ सामनेमाचे थे। किसी माननीय और प्रतिष्ठित अभ्यागत के आदर के लिये नत्य-गीत का आयोजन करने की प्रथा अब भी सम्प और असभ्य सभी जातियों में प्रचलिन है। प्राचीन काम में जब योदा लोग विजय प्राप्त करके लौटते थे, नय वे स्वयं भी नाचते गाते थे और उनका सत्कार करने के लिये नगर- निवासी भी उनके सामने आफर नाचते गाते थे। कभी कभी ऐसा भी होता था कि युर-क्षेत्र में बीर ओर योद्धा लोग जो कृत्य करके आते थे, उन कृत्यों का अभिनय भो नृत्य गोत के उन उत्सवी के समय हुआ करता था। मृतकों ओर मिशेषतः बोर सूसको के उद्देश्य से नायने की प्रथा परमा, चीन, जापान आदि अनेक देशों में प्रचलित थो। जो योदश वंश, जाति अथवा धर्म के लिये अनेक प्रकार के कष्ट सहकर प्राण देते थे, उनकी स्मृति बनाए रखने का उन दिनों यही एक साधन भामा जाता था। उक्त शो के नाटकी का आरंभ इन्दी नुष्यों से हुआ है। क्योंकि उन देशों के निवासी उस नृत्य के समय तरह नरह के चेहरे लगाकर स्वाँग चनते थे और उन घार मृतकों के चीरतापूर्ण कृत्यो का अभिनय करते थे। उन नुष्यों में कहीं कहीं, जैसे आपान और माया आदि देशों में, कुछ कथोपकथन भी होने थे, जिनसे उनको एक प्रकार से नारक का ही रूप प्राप्त हो जाता था। जापान में तो आज तक इस प्रकार के नृत्य प्रचलित है। आजकल भी जापान में जो नृत्य होता है, वह किसी म किसी ऐतिहासिक घटना अथवा
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