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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२००

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१७१ दृश्य काव्य का विकास कथामक से ही संबंध रखता है। ऐसे नृत्य प्रायः बड़े बड़े देव- मंदिरों में होते हैं, जिनमे उन मंदिरों के पुजारी भी अभिनय करते हैं। अभिनय के समय पात्र हरे लगाकर स्यांग भी धनते हैं। नास्पर्य यह कि जापान और दूसरे अनेक देशों के नाटकों की सृष्टि इसी प्रकार के नृत्यों से हुई है। जापानी भाषा में पेसे नाटकों को "मा" कहते हैं, जिसका अर्थ है दुःखांत अथवा वियोगांत नाटकः । वक्षिण अमेरिका के पेरू, बोलीचिया और ने जिल आदि देशों में अच तक इसी प्रकार के नृत्य होते है, जिनके पात्र चेहरे लगाकर मृत पुरुषों का अभिमय करते है। उनके कथोपकथन भी उन्हीं मृत आत्माओं की जीवम-संबंधी घटनाओं से संबड होते हैं। एलास्का प्रवेश के जंगली एस्किमो भी प्रति वर्ष इसी प्रकार का नृत्य और अभिनय करते हैं, जिनमै पात्रों को पशुओं आदि के चेहरे लगाने पड़ते हैं। ये नृत्य इस उद्देश्य से होते हैं, कि मृतकों की आत्माएँ प्रसन्न हो और अर्य भर खूब शिकार मिले। पश्चिमी अफ्रिका के बेल्जियन कांगों आदि कुछ प्रदेशों की अंमली जातियों में सो इस प्रकार के मूल्य और अभिनय इतने अधिक प्रचलित हैं कि उनके धर्मामायाँ आदि का व्यवसाय नाय ही रह गया है। नृत्य ही नाटक का मूज है, इस बात का एक अच्छा प्रमाण कंबोडिया की राजकीय रंगशाला भी है, जिसका माम "रंग-रम" है और जिसका अर्थ उस देश की भाषा में मृत्यशाला है। यहाँ हम प्रसंगवश यह भी बतला देना चाइते