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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२०३

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साहिन्यालोचन १८२ भेमी और प्रधान आविष्फर्ता थे और जिन्होंने कथोपकथन या संवाद तक को अपने साहित्य में स्थान दिया था. वे केवल अभिनय को किस प्रकार छोड़ सकते थे। जहाँ तक सम्भव था, वहाँ तक सीच-तान करके रिजय ने अपनी ओर से यह सिस करना चाहा है कि भारत में नाटकों की सृष्टि बहुत पोछे हुई है। पर फिर भी उन्होंने भारतीय नाटकों की सरि का कोई समय निर्धारित नहीं किया है। और अन्त में एक प्रकार से यह बात भी मान ली है कि पाणिनि और पतंजलि के समय तक भारत में नारको का यथेष विकास हो चुका था। अब विचारवान पाठक स्वयं ही सोच सकते हैं कि नाटक सरीने गूढ़ और गहन विषय का पूर्ण विकास होने में. और वह भी पणिनि-काल से पहले, कितना समय लगा होगा, ओर जिस नाटक का पाणिनि के समय में पूर्ण विकास हो चुका था, भारत में इसका आरंभ या बीजारोपण कितने दिनों पहले छुआ होगा। मयं रिजवे ने ही अपनी पुस्तक में एक स्थान पर लिखा है कि भारत की अनेक वानी के संबंध में लिखित प्रमाण नहीं मिलते। ऐसी दशा में ऋग्वेद के अनेक मंत्रों, संवादों और. आस्पानी तथा दूसरे प्रमाणों से, जिनका वर्णन हम आगे चलकर करेंगे. यह माना जा सकता है कि भारत में नाटक का सूत्रपान ऋग्वेद काल के कुछ ही पीले, पर लगभग वैदिक काल में ही हो गया था। जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, भारतवर्ष के नाटको