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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२०४

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१८३ Eश्य-काव्य का विकास का बिलकुल पूर्व और प्रारंभिक कप ऋग्वेष्ट में प्रार्थना-संघों और संबादों के रूप में मिलता है। यह तो निषित रूप से नहीं कहा जा सकता कि भारत में अभिनय ने अपना पूर्ण रूप किस समय धारण किया, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि पाणिनि से कई हमार वर्ष पहले इस देश में नाटकों का पूर्ण रूप से प्रचार हो चुका था और अनेक अच्छे अच्छे नाटक चन भी युफे थे क्योंकि पाणिनि ने अपने च्याकरण में नाट्य-शास्त्र के शिलालिन और कृशाश्य इन दो आचार्यों के नाम दिए हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि पाणिनि के समय तक इस देश के नाटक इतनी उन्नत अवस्था को पहुँच गपधे कि उनके लक्षण-अंथ तक बन चुके थे। नाट्य कला की बिलकुल आदिम अवस्था में अनान्य देशों की माँति इस देश के नट भी केवल नाचते और गाते ही रहे होंगे, परंतु शिद्धान्टिन और कृशाश्व के समय में नाटक अपनी पूर्ण उपनावस्था को पहुँच चुके थे अर्थात् उस समय तक इस देश में नाचने और गाने के अतिरिक्त नाटकों में संपाद, भाव-भंगी और वेष-भूषा आदि का भी पूर्ण रूप से समावेश हो चुका था और सांगपूर्ण अभिन्य होने लग गए थे। पाणिनि के सूत्रों की व्याख्या करते हुए पतंजलि अपने महाभाग्य में लिखते हैं कि रंगशालाओं में अभिनय होते थे और दर्शक लोग चे अभिनय देखने के लिये जाया करते थे। उन दिनों कंसषध और अलिचंच आदि तक के अभिनय होने लग गए