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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२०८

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१८७ रश्य-काव्य का विकास प्रसन्न होकर उस पुतली को समोव कर दिया था | महाभारत मैं मी कठपुतलियों का उल्लेख है। जिस समय कौरत्रों से युद्ध करने के लिये अर्जुन जा रहे थे, उस समय उचरा ने उनसे कहा था कि मेरे लिये अच्छी अच्छी पुतलियाँ या गुड़ियाँ नेते आमा । कथा-सरित्सागर में एक स्थान पर लिखा है कि असुर मय की कन्या सोमप्रभा ने अपने पिता को बनाई बहुत सो कठपुतलियाँ रानी कलिंगसेमा को दी थीं। उनमें से एक कठपुतली ऐसो थी जो राटी वयाने ही हवा में उड़ने लगती भी और कुछ दूर पर रखी हुई छोटी मोटी चीजे तक उठा लाती थी। उनमें से एक पुनलो पानी भरती थी, एक नाचती थी और पाक बातचीत करती थी। उन पुरलियो की देख- कर कलिंगसेना इतनी मोहन हो गई थी कि वह दिन रास उन्हीं के साथ खेला करती थी और खाना-पीना तक छोड़ बैठी थी। यह तो सभी लोग जानते है कि कथा-सरित्सागर का मूल गुणा वृत हत्कथा है, जो बहुत प्राचीन काल में पैशाची में लिखी गई थी. पर यह हरकथा अब कहीं नहीं मिलती। हमारे कहने का तात्पर्य केवल यही है कि गुणा के समय में भी भारत में ऐसी अच्छी अच्छी कठपुतलियाँ बनतो यी जो अनेक प्रकार के कठिन कार्य करने के अतिरिक्त मनुष्यों की भाँति यात चीन तक करनी थीं। ये कठपुतलियाँ कोरी कवि-कल्पना कदापि नहीं हो सकी। कथाकोष में खिसा है कि राजा सुंदर ने अपने पुत्र अमरचंद्र के विवाह में