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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२०९

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साहित्यालोचन १८८ कठपुतलियों का नाष कराया था। इन सब बातों से सिद्ध होता है कि बहुत प्राचीन काल में ही भारत में कठपुतलियों का नाच बहुन उनत दशा को प? चुका था । राजशेखर ने क्सवीं शतानी के आरंभ में जो बालरामायण नाटक लिखा था, उसके पांचन अंक में भी कठपुतलियों का उल्लेख है। उसमे लिखा है कि अमुर मय के प्रधान शिष्य विशारद ने दो कठपुतलियाँ बनाई थी, जिनमें से एक सीता की और धूसरी सिंदूरिका की प्रतिकृति थी। ये दोनों कठपुतलियाँ संस्कस और प्राकृत दानो भाषाएं बहुत अच्छी तरह बॉल सकती थीं। उन दोना का पारम्परिक पार्तालाप इतना स्पए और सदर था कि रावणा ने उन कठपुतलियों को हरी सीता और सिंदूगिका समझ लिया था। उसे अपनी भूल उस समय मालूम दुई जब उसने सीना की प्रतिकृति को गले से लगाया। राज. शेखर केस उएलेख से कम से कम इतनाना अवश्य सिर होता है कि इसवी शताब्दी में भारत की रंगशालाओं में साधारण नाटक के अतिरिक्त कठपुमलियां तक का प्रवेश कराया जाता था। संस्कृत के समी और हिंदी के भी प्राय. नाटकों में सबसे पहले सूत्रधार का प्रवेश होता है। यह मूत्रधार मानों रंगशाला का ब्यवस्थापक और स्वामी होता है। यह सबसे पहले रंगशाला में आकर कोई प्रार्थना गीत गाता है और तब किसी न किसी रूप में दर्शकों को नारक के नाम, कर्ता और विषय आदि का परिचय कराता है। यह सूत्रधार और स्थापक