१९६ साहित्यालोचन वश्यकता है: भित्र भित्र अघसरों पर उनके यम और वेष-भूषा आदि कैसी होनी चाहिए, नाईक कैसे और कितने प्रकार के होते हैं, वाद्यों के कितने भेद ओर प्रकार हैं: आदि । उसमें यह मी बतलाया गया है कि किरात, अर्चर, अंध, इविड, पुखिक, काशो, फौशल और दाक्षिणात्य आदि जातियों के पात्रों का अभिनय करनेवाले नटों का रंग काला कर देना चाहिए: शको, यवनो और चाह्रीको आदि की अभिनय करनेवाले नटों का रंग सफेद करना चाहिए, आदि आदि। दाक्षिणात्य, आयंत, नद्र- माम्धी और पांवालम ये नाटकों की चार रीनियाँ गिनाई गई है और लाया गया है कि किन किन देशों के लोग किस रीतिका नाटक पसंद करते हैं। रसके अतिरिक्त उस समय की सात प्राकृत भाषा और पाँच विभापार्य भी गिनाई गई हैं। और भी अनेक ऐसी गंद दाते हैं जिनका आजकल समझना ही बहन कठिन है और जिनको समझने के लिये बड़े बड़े पडितों की भी वयाँ उनका अध्ययन करना पड़ेगा। अब हम मंशप में भरन मुनि के नाटर गात्र की प्राचीनला का कुछ विचार करके इस विषय को समाप्त करते हैं। ग्रंय में फुड प्राचीन मूत्र भी दिए गर हैं जिनफे साथ प्राचीनना भाप, कारिका, निप्रदु और निरुक्त भी है। इससे सिद्ध होता है कि जिस समय इस श्लोकय ग्रंथ की रचना हुई थी, उस समय उन प्राचीन सूत्रों पर भाष्य और कारिकाएँ आदि भी रिखी जा चुकी थीं। अंथ में जिन अनेक नाट्यशासा
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