१९९ पश्य-काव्य का विकास का आरंभ यहाँ के गद्य और गीति-काव्यों से हुआ था। साहि- त्यिक इतिहास के अनुक्रम में पहले गय, तव गीति-काव्य और तब महाकाव्य आते हैं। इससे सिद्ध होता है कि जिन नारों का आरंभ गीति-काव्यों और महाकाव्यों से हुआ हो, उनकी अपेक्षा वे नाटक अधिक प्राचीन हैं, जिनका मुल गछ और गीति-काव्यों में हो। हमारे यहाँ इस ढंग के प्राचीन नाटकों का अपशेष अव तक बंगाल की यात्राओं और वज़ की रास लीलाओं के रूप में वर्तमान है। यद्यपि ठीक ठीक यह नहीं बतलाया जा सकता कि भारत में शुद्ध और व्यवस्थित रूप में भाटको का आरंभ कर दुआ, तथापि अनेक प्रमरणी से यह अवश्य लिड है कि ईसा से कम से कम हजार आठ सौ वर्ष पहले यहाँ नाटकों का यथेट प्रचार था: और ईसा से चार पाँच सौ वर्ष पहले यहाँ को नाश्च कटा इतनी उन्नत हो चुकी थी कि उसके संबंध में अनेक लशण ग्रंथ श्री यन गए थे। इस प्रकार हमारे यहाँ के नाटकों का कमबद्ध इतिहास उस समय से आरंभ होता है, जिस समय घे अपनी उन्नति के सवोच्च शिखर पर थे और जिसके उपरांत उनका हास अपरंभ हुआ था। आज से कुछ ही दिनों पहले महाकवि कालिदासी संस्कृत के आदि नाटककार माने जाते थे पर अब इस बात के अनेक प्रमाण मिल चुके हैं कि कालिदास से चार पाँच सौ वर्ष पहले भी संस्कृत में अनेक अच्छे अच्छे नाटक बन चुके थे। पहले तो कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक में ही उनसे पहले के मास
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