साहित्यालोचम और कषिपुध माविक एसिड नाटककारों का उझेख मिलता है, और तिस पर अब द्रावन कार में भास के अनेक नाटक मिल मी गप है जिनमें से कई प्रकाशित की हो चुके हैं। इसके अति- रिक प्रश्य पशिया में भी बीद-कालीन अनेक मंडित झाटको की हस्त-लिखित प्रतियाँ मिली है, जिनमें से एक कनिष्क के राज- कवि अश्वघोष का बनाया दुना है। इन सब नाटकों की रचना, शैली और भाषा आदि भी प्रायः वैसी ही है, जैसी कि पीढ़े के और नाटको को है। इससे सिद्ध होता है कि इन नाटको के बनने से पहले भी इस देश में नारक रचना के संबंध में नियम आदि बन चुके थे और उनके लवण-ग्रंथ लिये जा चुके थे। परंतु हमारं नाटकों के विकास का यह काल अभी तक अज्ञात काल दी माना जाता है. अनः इसे हम यहीं छोड़कर शत काल की कुछ बाते कहते है। हमारे नाटकों के मान काल का आरंभ महाकवि कालिदास से होता है और उनके समय से लेकर सवा दसौं शताब्दी तक उसका आरमिक काल माना जाता है। पर हमारी समझ में यह उसका आरंभिक काल नहीं बल्कि मध्य काल है। कालिदास का पहला नाटक मालविकाझिमित्र है जिसके कई पात्र मेतिहा- सिक हैं। अशिमित्र का समय ईसा से रेद दो सौ वर्ष पहले का तो अप है, चाइइससे और कुछ पहले का ही क्यों न हो। दूसरा नारक शकुंतला है जिसकी गणना संसार के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में होती है। उनका विक्रमोर्वशी नारक भी बहुत ही
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