कला पर साहित्यालोचन जो नाटक बने, वे नाट्यकला की रष्टि से उतने अच्छे नहीं है, मितने अच्छे उनसे पहले के बने हुए हैं। इसी लिये इम उनका कोई उल्लेख न करके एक दूसरी बान पर विचार करमा चाहते हैं। संस्कृत के नाटकों में यवनिका, यवनी और शकार आदि शब्दों के आधार पर पहले कुछ विहान कहा करते थे कि भारत- भारतीय वाय. वासियों ने नाट्य-कला युनानियों से सीखी थी। यपि आजकल इस मस के समर्थकों की संख्या यूनानी प्रभाव रहुत ही कम हो गई है और अधिकांश विद्वान् यही मानने लगे है कि भारतवासियों ने अपनी नाट्य कला का विकास विलफुल स्वतंत्र रूप से किया था, तथापि इस संबंध में इम दा एक बाते कह देना आवश्यक समझते हैं। पहली बात सा यह है कि भारतवासियों ने उस समय भी अच्छे अच्छे नाटक तैयार कर लिया ये, जिस समय यूनानियों में नाट्यकला का विकास आरंभ ही दुना था । दूसरे भारमवासियों ने कभी यूनानी भाषा अनाही तरह मीखी ही नहीं । कूशन राज दरबार मैं कभी कभी यूनानी भाषा बोली जाती थी, पर वह बहुत ही टूटी फूटी होनी थी। यहाँ के सिकी आदि पर जा यूनानी भाषा मिलती है, घर भी मायः बहुन रही होती है। भारत में कभी कोई साहित्यिक यूनानी भाग जामता ही नहीं था। भारत- बासियों में ज्योनिय संबंधो कुछ बातें अवश्य यूनानियों से सीसी थीं, पर उनकी शिक्षा प्राप्त करने के लिये यहाँ से लोग
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