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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२२४

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२०६ इश्व-काव्य का विकास बाहर गए थे। ज्योतिय सरीखे विषयों की शिक्षा के लिये लोगों का विदेश जाना तो विशेप आयर्यजनक नहीं है, पर नाटय-कला की शिक्षा प्राप्त करने के लिये विदेश जाना प्रायः कल्पनातीत ही है। हाँ, यह संभव है कि भारतवासियों ने नाटकों के परदे आदि यूनानियों से बनवाए हो; अथवा ये उस देश के वने कपड़े के बनाए जाते हो और इसी लिये उनका नाम अनिका रम्मा गया हो । इन शब्दों से तो अधिक से अधिक केवल यही सूचित होना है कि जिस समय हमारे यहाँ के अच्छे अच्छे नाटक बने थे, उस समय यवनों और शकों आदि के साय हमारा संबंध हो चुका था। तीसरी बात यह है कि भारतीय और यूनानी नाटकों के तम्पों आदि में आकाश-पाताल का अंतर है। हमारे यहाँ दुःमान और सुखांस का कोई अगड़ा ही नहीं है। हमारे सभी नाटक सुखांत होते थे और रंगमंच पर हत्या, युर आदि के दृश्य दिखलाना यजित था । यूनानी नाटकों में केवल चरित्र- चित्रण की ही प्रधानना है. पर हमारे यहाँ प्राकृतिक शोभाओं के वर्णन की और रसी की प्रधानता मानी गई है। विक्रमोर्वशी का आरंभ ही हिमालय के विशाल प्राकृतिक हमय से होता है। उसररामचरित और शकुंनया में भी प्राकृतिक शांभाओं का ही वर्णन है । यूनानी नाटक बहुभा खुलं मैदानों में होते थे, अथवा ऐसे अनाड़ों आदि में होते थे जिनमें और भी अनेक प्रकार के प्रेस तमाशे होते थे। पर भारतीय नाटक एक विशेष प्रकार की जमी हुई रंगशालाओं में होते थे। सायंश यह कि कदाचिद