२०५ दृश्य-काय का विकास मारक भी होने लगे थे। वे नाटक दिन भर होते रहते थे और उनकी व्यवस्थाराज्य की ओर से होनी थी। भिन्न भिन्न स्थानों में यह उत्सव पसंतातु के आरंभ, मध्य अयवा अंत में हुआ करता था। उस उत्सव के साथ जो नाटक होते थे, उन्हें देखने के लिये दर्शकों को किसी प्रकार का प्रवेश-यत आदि नहीं देना पड़ता पा: पर उन्हें अपने लिये शिौने और जलयान आदि का स्वयं ही प्रबंध करना पड़ता था। परंतु उस समय जो अभिनय होते थे, वे पूरे नाटक नहीं कहे जा सकते। हाँ, उनमें नाटकों का बिलकुल पूर्व रूप अवश्य च्या। वास्तविक नाटकों और व्यवस्थित नादक मंडलियों की रचना और संघटन तां यहाँ ईसा से केवल चार पाँच सौ वर्ष पहले ही आरंम हुआ था। प्राचीन काल में युनान के डोरियन राज्यों में यह मथा प्रचसिन थी कि लोग देव-मदिरों में एकत्र होकर भजन और नृत्य किया करते थे। यहां की सारी प्रजा प्रायः सैनिक या क्षत्रिय थी, अतः उस नृत्य में सैनिकों के अन्यों आदि का साथा- रण अभिनय हुआ करता था। आगे चलकर उसमें यह विशेषता उत्पन्न हुई कि भारतीय सूत्रधारों की सरह यहाँ के कवि भी अपनी मंडलियाँ संघटित करने लगे ओर अपने सिखाए हुए गायकों और नतंकी को साथ लेकर धार्मिक उत्सवो के समय ऐसे अभिनय करने लगे जो नाटक का पूर्व कप कहे जा सकते है। धीरे धीरे उन नन्यों ने कई भित्र भित्र स्वरूप प्राप्त कर लिए और उन्हीं स्वरूपों से आगे चलकर दु:ति और सुशांत नारको
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