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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२२७

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हम "अजा- साहित्यालोचन २०६ की सुष्टि हुई । उनमें से एक प्रकार का नृत्य, नृत्य" कह सकते हैं, बहुत प्रचलित हुआ। इस नृत्य में पचास आदमी होते थे जो ऐसे वेष धारण करते थे जिनके कारण वे आधे मनुष्य और आधे पशु आम पढ़ते थे। उनको पकरी का चेहरा लगा दिया जाता था और उनके घर तथा कान मी चक- रियों के पैरों और काना के समान बना दिए जाते थे। वे लोग जो गीत गाने थे. मे "ट्रेजेडी" (uragelr) कहलाते थे जिसका भावार्थ "अजामीन" है। आगे चलकर इन्हीं अजा-गीतों से दुःस्त्रांत नाटकों की सृष्टि हुई थी। इन अजा-गोनों का यूनानियों के डायोनिसस देवता के स्वरूप के अनुसार ही नामकरण हुआ था। हमारे यहाँ के गणश और सिंह आदि के समान डायो- निसस कास्वरूप मेल और बकरी के स्वरूप का सम्भिवया माना मासा था। मूर्तियों में उसके सिर पर साँई के सींग लगाए जाते थे और उसका शरीर पकरी की साफ के समान रखा जाना था । प्राचीन काल में यूनान के सींग स्थर्य भी यकरी की थाल पहना करते थे और अब तक कहीं कहीं यहाँ के देहातियों और खेतिहरो की यही पोशाक है। आजकल भौधेस आदि कुछ स्थानों में बज की गस लोलाओं और बंगाल की यात्राओं की भाँति पुराने इंग के कुछ नाटक होते हैं, जिनमें पात्र आदि बकरी की साल पहनकर अभिनय करते हैं। एक और स्थान में लोग पड़ास्टस नामक एक स्थानिक देवता के उत्सव में भी इसी प्रकार के नृत्य आदि करते थे। यूनान की पोराणिक कथाओं के