२०७ हश्य-काव्य का विकास अनुसार सायोनिसस और पास्टस दोनों को अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़े थे; और यूनानियों के अभिनयों के मुख्य आधार. यही देवता और उनके चरित्र आदि होते थे, जिनमें विपत्तियों और. कष्टों की ही अधिकता होती थी। यही कारण है कि यूनान के दुखत नाटकौ का मूल ये अज्ञा-गीत ही माने जाते हैं। यहाँ यह बात भी ध्यान में रस्थने योग्य है कि यूनानी दाहात नाटको का अंत वास्तव में दुःखपूर्ण नहीं होता, यहिक फेयत मध्य ही दुःखपूर्ण होता है, क्योंकि उनके देवताओं ने, पौराणिक कथाओं के अनुसार, दुख भोगने के उपरांत अंत में विजय ही मात की थी। हां, आगे चलकर उनके अनुकरण पर और और देशों में ओ नाटक स्ने, वे प्रायः दुःखात ही थे। यपि ये अज्ञा-गीन युरोप के आधुनिक दुःयांत नाटकों के मल रूप है, तथापि यूनान में वास्तविक दुःखांन नाटकों का आरम्भ महाकवि होमर के : लिघड महाकाव्य की रचना के अनंतर हुआ था। पहले तो देषताओं के सामने कचत्व नृत्य और गरत होते थे, पर. पीछे से उनमें संघाह या कथोपकथन भी मिला दिया गया था। गायकों का प्रधान एक मंच पर खमा हो जाता था और शेष गायकों के साथ उसका कुछ कधोपकथन होता था। पर इस कथा का मूल संभवतः महाका होमर' का इलियड महाकाव्य था। पहले कुछ मित्र मंगे शहरों में इलियड महाकाव्य के इधर उधर के अंश गाते फिरते थे,जो खोगों को बहुत पसंद आहे थे और जिनका प्रचार श्रीष ही
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