साहित्यालोचन २१२ को सभ्यता और बल की वृद्धि के साथ ही साथ वहाँ नाटको की भी ख्य उन्नति हुई थी। पर ईसा को चौथी शताप्नी के मध्य में, जब ईसाई पादरियों का जोर बहुत बढ़ गया और वे नाटको तथा अभिनयों की बहुन निना और विरोध करने लगे, रोम में नाच-कला का हास आरंभ हुआ। जब गमन लोग रंग-शालाओं में अपने भनाविनाद के लिये अनेक प्रकार के करता और निर्दयतापूर्ण ग्रेल कराने लग गए और उन रंग. शालाओं के कारण लोगा में विलासिता बटुन कह गई, तय नाटको आहि का और भी घोर निराध होने लगा और राज्य की ओर से उनकाचार रोकने के लिये अनेक प्रकार के नियम धनने लगे। यह निधय किया गया कि नट लोग ईसाइयों के धार्मिक उत्सवों आदि मैं न सम्मिटिन हसिक और जो लांग रविवार या दुसरी दुट्टियों वै. दिन गिरजा में न जाकर नाट्य- शालाओं में जाया कर, ये समाज-न्युन कर दिए जायें । उस समय अधिकांश युगेप में, और विशेषतः गम में, ईसाई धर्म का बहुत अधिक जार था, यहाँ तक कि राजकीय अधिकार भी प्रायः धर्माचायों के ही हाथ में थे। अतः उनके विरोध कारण रोम में नाट्य-कला का द्वास होने लगा और अंत में नाटक बिलकुल उट गए। इसके कई सौ वर्ष पीछे ईसाई धर्माचायौं तथा कुछ और लोगों ने फिर से धार्मिक तथा नैतिक नाटकों का प्रचार आरंभ किया था । हम पहले कह चुके हैं कि धर्माचार्यों और पादरियों आदि
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