२१९ रश्य-काय का विकास समझ जाते थे। उनको सार्वजनिक परीक्षाओं तक में सम्मि- लित होने का अधिकार नहीं था। पहले यहाँ खियाँ भी रंग- शाला में अभिनय किया करती थी, पर जब से एक नटी को सम्राट् स्पिन-लांग ने अपनी उपपली बना लिया, तब से वहाँ की रंगशालाओं में स्त्रियों का प्रवेश यंत्र हो गया । एशिया में भारत और चीन यही दो ऐले देश जिनमें बहुत प्राचीन काल में और स्वतंत्र रूप से नाटकों का आरंभ, प्रचार और विकास हुआ था। अन्यान्य देशों में बहुधा इन्हीं पानी देशी से नाटक गए हैं। स्याम और मस्टय आदि देशों में भारत की नेखादेलो और जापान में कील के अनुकरण पर नाटकों का आरंभ और प्रचार हुआ था। यद्यपि अरष देश का साहित्य बक्षुन उनन और पूर्ण है, तथापि यह बड़े आर्य का विषय है कि वहाँ नाटकों का कभी आरंभ और प्रचार भा ही नहीं। भाटको की और अरबवाली की प्रवृत्ति बहुन पीछे छुई है और अब भी यहाँ मालिक नाटकों का अभाव ही है। आजकल अरबी भाषा में जो थोड़े बहुत नाटक मिलते भी हैं, वे दूसरी भाषाओं के अनुचार | इस्लाम धर्म मैं तो अवश्य ही नभ्य-गीत आदि की मनाही है, पर आश्चर्य है कि उसके प्रचार के पहले यहाँ नाटकों का आरंभ क्या नही दुआ। जिस मित्र देश में बहुत प्राचीन काल में भी किसी न किसी रूप में अनेक नाटक वियमान थे, उस निम्न देश में भी अब निज का कोई नाटक नहीं रह गया है। जो
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