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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२४३

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साहित्यालोचत्त २१२ रंगशालाएँ बहुत बढ़ गई हैं जिनमें अनेक प्रकार के सामाजिक, ऐतिहासिक और धार्मिक नाटक होते हैं। इधर कुछ दिना से कहाँ कहाँ राजनीतिक नाटक भी होने लगे है। विशेषतः बंगा- लियों, महाराष्ट्रों और गुजरातियों ने इस विषय में बहुत कुछ उपति की है और उनकी रंगशाला बहुम अच्छे ढंग से चलती है। रंगशालाओं के साथ ही साथ इन लोगों ने अपनी अपनी भाषा में अनेक उसमोसम नाटकों को भी रचना की है। पर हमारी हिंदी में महाँ और अनेक बातों का अभी आरंभ हुआ है, यहाँ नाटकों में भी आरंभ ही समझना चाहिए। अहिक यदि यह कहा जाय कि हिंदी में पंगला, मराटी या गुज- राप्ती के ढंग के अच्छे अच्छे नाटकों की रचना का श्रीगणेश भी नहीं हुआ है, तो कोई अत्युक्ति न होगी। पर इस विषय में और बातें कहने के पहले हम संप में हिंदी नाटकों का कुल इनिहास देना चाहते है। या कहने को चाहे हिंदी में नेवाज कवि कुन शकुंतमा नाटक, हृदयराम कुन हनुमनाटक, या यजयासीदास कृत प्रबोधचंद्रा- दय आदि की सौ वर्ष पहले के बने हुए कई नाटक दिदी नाम वर्तमानसी. पर यास्तव में नालय-फला की रष्टि से ये नारक नहीं कह जासकते.क्योंकि टन रचनाओं में नाटक के नियमों का पालन नहीं किया गया है और ये कोरे काव्य ही काव्य है। हाँ, प्रभावती और आनंद रघुनंदन आदि कुछ नाटक अवश्य ऐसे हैं जो किसी प्रकार नाटक की सीमा में आ सकते हैं। कहते