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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२४४

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२२० रश्य-काव्य का विकास है कि हिंदी का पहला नाटक भारतेंदु चावू हरिशंद्र के पिता श्रीयुक्त वाकू गोपालचंद उपनाम गिरधरदासकृत नहुप नाटक माना जाना चाहियः पर वह भी साधारण शलचाल की हिदी में नहीं, बल्कि प्रज भाषा में है। इसके उपरांत गजा लक्ष्मर्णासह ने शकुमला नाटक का अनुवाद किया था। यद्यपि यह नाटक भाग आदि के विचार से बहुत अच्छा है, परंतु वह मौलिक नाटक नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह कालिदास-कृत शकुंतला नाटक का अनुवाद है। मारनंदु बा हरिद्र ने तो मानों नाटक-रचना से ही आधुनिक हिंदी का जन्म दिया था। उन्होंने लगभग गैस नाटक लिन थे जिनमें से अधिकांश अनुषाद नहीं, तो शायानुवाद अवश्य थे । नी भी उनके कई मारक बहुत अच्छे है और अब भी अनेक स्थानों में समय समय पर देखे जाते है। लाला श्रीनिवासनास-कतरणधीर प्रेममोहिनी या पंडित कांशष- राम भट्टकृत सजाद-संयुल और शमशाद सौसन आदि नाटक अवश्य अन्तु है, पर वे प्रायः इतने बड़े हैं कि उनका पूरा पूरा अभिनय नहीं हा सकना । यही दशा, बल्कि इससे मी कुछ और बढ़कर, पडित वरीनारायण चौधरी-कृतभारत-सौमाम्प नाटक की है । बाच नानाराम कृत केटो-छात, यापंडित चालकृष्णभा- छत कई नाटक है सही, पर कई कारणों से उनका भी सर्वसाधा- रण में कोई विशेष आदर नहीं है। यही वास साहित्याचार्य पंडित अंधिकापस च्यासहन ललिता नाटिका या घेणीसंहार और गौसंकर आदि माटकों की है। मृच्छकटिक नाटक के