२२९ दृश्य-काश्य का विवेचन बतलायेगे जो नाटक और उपन्यास में पाई तो समान रूप से ही जाती हैं, पर जिनका उल्लेख हमने जान बूझकर उपन्यास के प्रकरण में इसलिये नदी किश था कि नाटक का विवेचन करते समय ही ये सहज में मनाई जा सकती हैं। सब से पहले हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नाटक रश्य काम्य है और इसकी इसी विशेषता के कारण उसकी रचना के मिशांतों आदि में भी कुछ जारको की विशेषरा विशेषताएँ आ जाती है। उपन्यास की रचना केवल पढ़ने के लिये होती है, पर नाटक की रचमा रङ्गशाला में अभिनय करने के लिये होती है। उपन्यास की रक्शाला तो उसी में होती है, पर नाटक की रङ्गशाला उससे बाहर और अलग होती है। महाकाव्य और गद्य-काव्य तो हमें किसी बात की सूचना मात्र देकर रह जाते हैं, पर नाटक हमें दूसरी का अनुकरण या नकल करके हम सब बाते प्रत्यक्ष कर दिखलाते हैं। जब हम कोई उपन्यास या और कोई काव्य पढ़ने बैठते है, तब हम ये सब बातें अनायास ही मम लेने हैं। इसके अतिरिक्त हमें और किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। पर जब हम को नाटक हाय में लेकर पढ़न बैठते हैं, तब वह हमें उपन्यास के समान सर्वांग- पूर्ण नहीं जान पड़ना, बल्कि हमें उस नाटक के लिये किसी और पान की आवश्यकता भी प्रतीत होती है। हमें कुछ ऐसे सत्वों की अपेक्षा होती है जो उसके केघल छपे हुए कप मै हमें
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