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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२५२

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२३१ पश्य-काव्य का विवेचन नाटक माटक को रनमा बहुधा रंगशाला की परिस्थितियों के अनुसार ही होती है। इसी लिये जो लोग कालिदास या भास के भाटक पदमा चाहते हो, उन्हें इस बात का भी ज्ञान प्राप्त कर खेना आवश्यक है कि उन कचिग के समय की रंगशालाएँ कैसी होती थीं और उनकी क्या व्यवस्था यो। गय काध्य के विवेचन में हमने बनाया है कि उपन्यास के छः तन्य होते है, यथा-वस्तु, पाध, कथोपकथन, देशकाल, शैली और उद्देश्य । यही छ तत्व नाटक में भी समान सत्व- रूप ले पाए जाते हैं, इसलिये हम नारक संबंध यग्नु में भी इन नन्छों पर अलग अलग विचार करेंगे। यहाँ पर हम यह कह देना उचित समाते हैं कि हमारे आचार्यों ने नास्य के बल तीन मन्य माने है-अर्थान् यस्तु, नायक और इसी आधार पर उन्होंने रूएका के भेद और उपभेद निश्चित किए है। यह समझ में नहीं आता कि जिस देश में नाटकों का अत्यंत प्राचीन रुप कथोपकथम ही वदों में रक्षित हो, उस हमारं आवायों ने एक मुख्य नत्व क्यों नहीं माना । इसमें संदेह नहीं कि कथोपकथन का समावेश "नायक" तत्व में भी आ जाता है। साथ ही देशकाल का विवंचन भी इसी तत्व के अंतर्गत लाया जा सकता है। पर उद्देश्य की ओर अलग ध्यान देने की आवश्यकता है। सुगमता और स्पष्टता के विचार से हम नाटक के तत्व भी उपन्यास के अनुसार मानकर उन पर विचार करेंगे। सब से पहले कथावस्तु को और रसः