२३३ रश्य-कान्य का विषेसा मोर फिर उस वश में अच्छे से अच्छेय आदि भी उनका मनोरंजन करने में असमर्थ होंगे। यही कारण है कि यदि कोई नया या अनभिश लेखक कोई महुन अच्छा, पर साथ ही चास बड़ा भाटक तैयार करता है, तो अभिनय के काम के लिये इसका पर अलग और संक्षिप्त रूप तैयार किया जाता है। अतः पहला सिर्शत यह निकला कि नाटक यथासाध्य संशित ओर ऐसा होना चाहिए. जिसके अभिनय में इतना अधिक समय न लगे जिससे दर्शक ऊन जायें। इस काम के लिये नाटककार को अपनी सारी सामग्री में से बहुत ही काम की और मुरुप मुख्य बान चुननी पड़नो हैं: ओर, जो गर्ने निसान आवश्यक न हो, उन्हें छोड़ देना पड़ता है। अच्छा माटककार केवल उन्हीं घटनाओं आदि के रश्य प्रस्तुन करता है जो बहुत ही आवश्यक और महत्वपूर्ण होती हैं। पूरी गमायण की छोड़ दीजिए, उसके किसी एक कोड की सारी बातों को लेकर भी को अच्छा नाटक नहीं बनाया जा सकना । अच्छा और अभिनय के योग्य नारक बनाने के लिये यह आवश्यक होगा कि उस कांड की कंबल मुख्य और महत्वपूर्ण बात से ली जायँ भोर साधारण बाने होड़ दी जाय । अथवा उनका उल्लेख ऐसे ढंग से ही जिसमें बिना समय लग ही दर्शकों को उमका शान हो जाय । इसीलिये हमारे यहाँ के प्राचीन अवार्यों में कथावस्तु के दृश्य ओर मुच्य ये दो विभाग किए हैं। जिन घटनाओं आदि का अभिनय बंगशाला में प्रत्यक्ष रूप से दिया.
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