साहित्यास्टोयम २३४ लाया जाता है, वे दृश्य कहलाती है, और जो पात या बटनाएँ किसी न किसी रूप में केवल सूचित कर दी जाती हैं, उनको सूच्य कहते हैं। अतः नाटककार को चित है कि जो पाते या घटनाप प्राचीन अचायों के अनुसार मधुर, उदात्त रस- पूर्ण, और आजकल की अवस्था को देखते हुए महत्वपूर्ण, आवश्यक और प्रभावशालिनी हो. उन्होको नम्नु फेश्य अंग में स्थान दे और जो बातें प्राचीन आचायौ के अनुसार नीरस अथवा अनुचित और आजकल की अवस्था को देखते हुए निरर्थक या कम महत्व की हो, उन्हें बस्तु के मुख्य अंग में स्थान है। अर्थान दर्शकों को किसी प्रकार उनको सूचना मात्र करा देनी चाहिए । बस. यस्तु के संबंध में यही मुख्य सिजग हैं जिनका नाटक लिखने के समय विशेष ध्यान रखना चाहिए । बस्नु के विस्तार और विभाग आदि का कुछ विवेचन आगे चलकर नाटकों के विभाग, प्रकार और भेट बतलाते समय किया जायमा । वस्तु की भाँनि चरित्रचित्रण के संबंध में भी नाटक और उपन्यास में बहुत अंतर है। कुछ लोग कहा करते हैं कि नाटकी में नाट्य की ही यधानता होती है. इसलिये उसमें धरित्र चिषण को विशेष महत्व देने की आवश्यकता नहीं और कुछ लाग यहो समझकर नाटक लिया भी डालते हैं। पर ऐसा समझना पड़ा भारी भूल है। नाटकी में भी चरित्र- चित्रण का उतना ही अधिक महत्व रहता है, जितना कि पात्र
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