२३५ श्य-काव्य का विषेसन उपन्यासों में उसे प्राप्त है। यदि किसी नाटक में केवल कोई कथानक या बटना-माला ही हो और उपयुक्त चरित्रचित्रण न हो, ना नाय कला की दृष्टि से उसका महत्व अमानत की इंगर-सभा से बढ़ कर नहीं हो सकता । वास्तव में परिचित्रण ही नाटक का सर्वप्रधान ओर स्थायी तत्व है। शेक्सपियर या छिर्जेद्रलाल राय के नाटकों का महत्व इसी लिये है कि उनमें चरिचिषण की प्रधानता है। उन नाटकों में मुख्यतः पात्रों के विचारों ओर भावों का विकास हो दिखलाया गया है, जो चरित्रचित्रण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। नाटक के दर्शकों पर सबसे अधिक प्रभाव और परिणाम इमी चरित्र' चिषण का पढ़ता है। यदि किसी नाटक का बस्नु-विन्यास नो यहुन अच्छा हो, पर उसमें चरित्रचित्रण का अभाव हो, तो संभव है कि साहित्य-तव में उस नाटक का आदर ही जाय, परंतु रंगशाला में वह कभी सर्वप्रिय न हो सकेगा। चाटक की कथावस्तु को भाँति उसका चरित्रचित्रण भी संक्षिम ही होना चाहिए। किसी बडुन यड़े उपन्यास के लिये तो यह धान आवश्यक होती है कि उसमें चरित्रचित्रण बहुत विस्तारपूर्वक हो, पर नाद ककार को परिचित्रण बटुन ही संकुचित सीमा के अंदर करना पड़ता है। क्योंकि उसे थोड़े से दृश्यों में ही चरित्रवित्रण भी करना पड़ता है और अपनी कहानी भी पूरी करनी पड़ती है। नाटकों के कथोपकथन का प्रत्येक शब्द कुछ विशेष महत्व का और अर्थपूर्मा हाना चाहिए
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