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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२५७

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साहित्यालोबत और उसके प्रत्येक अंग का सारे नाटक से कुछ विशेष संबंध होना चाहिए। उसके प्रत्येक पात्र का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो सारी कथावस्तु को देखते हुए बहुत ही उपयुक्त और आवश्यक जान पड़े। नाटक के शयफ या दूसरे प्रधान पात्रों के उन्हीं गुणों और विशेषनाओं आदि का प्रदर्शन होना चाहिए जिनका सारे नादक पर विशेष प्रभाव पडता हो। चरिवचित्रण आदि में नाटककार को एक ऐसी कठिनना का सामना करना पड़ता है जिससे उपन्यास लेखक चिलकुल मुक रहता है। उपन्यास लेखक तो समय समय पर स्वयं भी अपने उपन्यास के पानी में सम्मिलित हो जाता है और उनके भाव नथा विचार आदि स्पष्ट करने के लिये उनके संबंध में टीका-टिप्पणी भी करता नसता है। गर नाटककार को अपनी ओर से कुछ भी कहने का अधिकार नहीं होता। विशेषता सिस अवसर पर नाटककार को अपने क्रिम्मी पाप के पहुन सुधम भावों का प्रदर्शन करना पड़ता है, उस समय तो उसकी कठिनता और भी बढ़ जानी है। अब हमें यह तो मालूम हो गया कि उपन्यास और नाटक के चरित्रचित्रण में कहाँ और कितना अंतर होता है। पर अब बन्न यह उठता है कि नाटक का चरित्रचित्रणा होना कैसा चाहिए। जिन अवसर पर उपन्यास-खेवक अपनी और से बहुत सी आवश्यक यात कद डाखता है. उन अबसर्ग एर नाटककार का क्या करना अहिए। इसका उत्तर यही है