२३७ एश्य-काम्य का विवेचन कि नाटककार को स्वयं अपनी कथावस्तु और पात्रों के कथोप- कथन से ही यह काम लेना चाहिए और यह दिखलाना चाहिए कि किस पान का रंग-टंग कैसा है। यह कहा जा सकता है कि उपायास-लेखक भी तो अपने उपन्यास की कथावस्तु और पात्रों के कथोपकथन से ही अपने पात्रों का चरित्र चित्रित करता है। यह ठीक है, परंतु अंतर यह है कि उपन्यासकार को आवश्यकता पड़ने पर इस बात की पूर्ण स्वतंत्रता होती है कि वह अपनी और से भी रोका-टिप्पणी अथवा स्पष्टीकरण कर दे। गद्य-काव्य के विवेचन में हम यह पतला चुके हैं कि उपन्यास के चरित्रचित्रण में विशेगात्मक रा साक्षान् और अभिन्स्पात्मक या परीक्ष इन दो उपायों का अबलयन किया जाना है। विशेषात्मक प्रणाली में उपन्यास- लेखक समय समय पर आप ही अपने पात्रों के भावों और विचारों की व्याख्या करने लग जाता है; पर अभिनयामक में यह मानों आप अन्दग बड़ा रहता है और स्वयं पात्रों को अपने कधन और व्यापार से तथा उनके संबंध में दूसरे पात्रों की टीका-टिप्पणी नथा सम्मति से चरित्रचित्रण करने देता है। परंतु नाटककार को पहले प्रकार की स्वतंत्रता चिलकुल नहीं होती ओर उसके सारे चरित्रचित्रण का एक मात्र आधार अभिनयामक ही होता और इसी लिय नाटक के परिव- चित्रण में उपन्यास के चरित्रचित्रण की अपेक्षा विशेष योग्यता की आवश्यकता होती है।
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