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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२६१

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साहित्यालोसन २४० एक तो कुछ पात्रों के आपस के कथोपकथन से उनके चरित्र का परिचय मिलता है और दूसरे जब कोई पात्र कधोपधन किसी दूसरे पान का कोई उल्लेख या वर्मान करता है, तब इस उल्लेम्न या वर्णन से भी उस दूसरे पात्र के वरिष का ज्ञान होता है। साधारणतः किसी पाय भी बात- चीत से ही उसके चरित ओर आचरण आदि का बहुत कुछ पता लग जाना है। मानाटकमार मनोविज्ञान के सिद्धांत के आधार पर ही अपने नाटकों की रचना या पात्रों का चरित्र- चित्रण करते हैं, उनका मुख्य आधार प्रायः कथोपकथन ही हुआ करता है। कुछ दर्शक से होने है जो विस्मृत कयोप- कथन से जल्दी घबरा जाने है ओर जा यह चाहते है कि एक के पी एक पटनाग ही होनी चली जाये। स लोगों को इस पाल का ध्यान रखना चाहिए कि कुछ विशेष प्रकार के अच्छे नारकों में फेवल चरिअधिषण के लिये ही कथावकटन का विस्तार किया जाता है। पर हाँ, गह विस्तार नभी मक दश्य है जब तक वह अस्वाभाधिक न हो और चरिरचित्रण में सहायक होता रहे। यदि किसी पात्र से स्वयं उसी के संबंध में कोई बात कहलानी हो तो वह उससे अनजान में, महज़ में, प्रसंग लाकर और ऐसे ढंग से कहलानी चाहिए जिसमें वह अस्वाभाविक न जान पड़े। कभी कभी ऐसा भी होता है कि आरम्भ में हमें किसी पात्र के भाषों, ध्देश्यो या विचारों आदि का कुछ भी धास्तविक शान नहीं होता और कुछ दूर आगे