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पृष्ठ:साहित्यालोचन.pdf/२६४

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२४३ रश्य-काव्य का निधन गात कहते हैं। इम ऊपर जिस कथन का उझेख कर आए हैं, यह नियत भाग्य और सर्वश्राध्य दोनों के अंतर्गत आ सकता है। पर अब हम अवाश्य या स्वगत के संबंध में कुछ कदमा चाहते हैं। जिस अवसर पर उपन्यास-लेखक स्वयं अपनी ओर से प्रत्यक्ष टीका-टिप्पणी करता है, उस अक्सर पर नाटककार इस अशाज्य या स्वमत कथन से काम लेता है। कथन के इस प्रकार का उद्देश्य बहुत ही स्पष्ट है। इस कथन- प्रकार के द्वारा नाटककार मैं उस पात्र के उन आंतरिक और. मूह विचारों आदि से परिचित कराता है जिन्हें वह साधारण कधोपकथन में प्रकट नहीं कर सकता। कभी कभी किसी पात्र के आचरणों को समझने के लिये हमें उसके आत- रिक भावी और विचारों से भी परिचित होने की आवश्यकता पड़ती है । उपन्यास-लेखक तो स्वयं अपनी ओर से लिखकर भी हमें उन आंतरिक भावों और विचारों से परिचित करा सकता है, पर नाटककार को ऐसे अवसर पर इसी स्थगत कथन को शरण लेनी पाती है। स्वगस कथन के समय पात्र मानो अपने मन में कोई बात सोचता है, और जो कुछ सोचता है, वही अपने मुँह से इस प्रकार कह चलता है, मानों और कोई उसको बात सुनता ही नहीं। पर यह बोलसा कुछ जोर से है, इसलिये दर्शक उसको सच वाते मुन लेते और उसके आंतरिक भाषौ और विचारों से अवगत हो जाते हैं। यह ठीक है कि किसी मनुष्य का आप ही आप बड़बड़ाना या