१४७ रश्य-काव्य का विवेचन आता है । यो सो उपन्यास में देश-काल के संरंध में जिम बातों का विचार रखना पड़ता है, मायः उन सभी बातों का संकलन-प्रय 'चिचार माटक के देश-काल में भी रहना पड़ता है पर देश-कान का विवेचन करते हुए हमें प्रसंगवश नाटक के संकतन- अय पर विचार करना आवश्यक जाग पड़ना है। यह संकलम काल और देश के अतिरिक्त वस्तु के संबंध में भी होता है। इनको घस्तु-संकलन, काल-संकलन और देश या स्थल-संकलन कहते हैं। यद्यपि ये तीनों संकलन प्राचीन यूनानी नाटकों के मुल्य अंग थे ओर अत्र प्रायः फ्रांसीसी माटकों को छोड़कर और कही देखने में नहीं आते. तथापि इन पर भी कुछ विचार करना आवश्यक जान पड़ता है। प्रायः आशेप किया जाता है कि भारतीय भाटकों में इस संफलम जय का कुछ भो ध्यान नहीं रखा जाना । अतः यहाँ पर हम यह दिखलाने का उद्योग करेंगे कि यह संकलन-त्रय किस सीमा तक आवश्यक है और उसके उपरांत कहाँ से मनावश्यक और निरर्थक हो जाता है। इस विवेचन से यह भी सिम हो जाएगा कि आगे के नाटकों में इस संकलन-प्रय का कितना और कैसा विचार रखना चाहिए । प्राचीन यूनानी आचार्यों ने यह सिद्धांत स्थिर किया था कि आदि से अंत तक सारा अभिनय किसी एक ही कृत्य के संबंध में होना चाहिए, किसी एक ही स्थान का होना चाहिए, और गफ ही दिन का होना चाहिए। अर्थात् एक दिन में एक स्थान पर जो जो रुन्य हुए हों, उन्हीं
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